Wednesday, 2 September 2026

द ऑब्जर्वर विदिन: कॉस्मिक वेव्स से समाधि तक

 

द ऑब्जर्वर विदिन: कॉस्मिक वेव्स से समाधि तक

पतंजलि योग दर्शन, योगवासिष्ठ, Orch-OR और आधुनिक चेतना-विज्ञान

हम सामान्यतः स्वयं को ब्रह्मांड से अलग एक स्वतंत्र व्यक्ति मानते हैं। लेकिन जीवविज्ञान बताता है कि मनुष्य वास्तव में एक खुली हुई जैविक प्रणाली है। हर क्षण हमारा शरीर वातावरण के साथ पदार्थ, ऊर्जा और सूचना का आदान-प्रदान करता है। हम वायुमंडल से ऑक्सीजन लेते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालते हैं, त्वचा के माध्यम से ऊष्मा का आदान-प्रदान करते हैं और प्रकाश, तापमान, ध्वनि तथा स्पर्श जैसी बाहरी उत्तेजनाओं को तंत्रिका तंत्र के माध्यम से अनुभव करते हैं।

इस दृष्टि से त्वचा केवल शरीर की दीवार नहीं, बल्कि एक biological interface है। Epidermis, dermis और subcutaneous tissue मिलकर शरीर को बाहरी वातावरण से जोड़ते हैं। Sweat gland से sweat duct और फिर pore के माध्यम से पसीना बाहर आता है और evaporation द्वारा शरीर का ताप कम होता है। इसी प्रकार फेफड़े वातावरण और शरीर के बीच निरंतर आदान-प्रदान का माध्यम हैं—वायु फेफड़ों में आती है, alveoli में गैसों का आदान-प्रदान होता है और ऑक्सीजन रक्त तक पहुँचती है।

यह हमें wave की एक सुंदर दार्शनिक उपमा देता है। लहर का अपना आकार होता है, लेकिन वह समुद्र से अलग नहीं होती। उसी प्रकार मनुष्य एक dynamic pattern है, जो अपने वातावरण से निरंतर जुड़ा हुआ है। हालांकि इसे quantum physics द्वारा आध्यात्मिक सत्य का प्रमाण नहीं कहा जा सकता।

अब यहाँ पतंजलि योग दर्शन प्रवेश करता है। पतंजलि कहते हैं—

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”

अर्थात योग चित्त की वृत्तियों के निरोध या स्थिरीकरण की प्रक्रिया है। हमारा सामान्य मन विचार, स्मृति, भावना, इच्छा, भय और prediction से निरंतर गतिशील रहता है। योग इस मानसिक fluctuation को नियंत्रित करते हुए धारणा, ध्यान और अंततः समाधि की ओर ले जाता है।

योगवासिष्ठ इस प्रश्न को और गहरा करता है। हम जिस संसार को अनुभव करते हैं, वह केवल बाहरी वस्तुओं का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। प्रकाश आँख तक आता है, retina उसे neural signals में बदलता है, brain उनका processing करता है और अंततः हमें “वस्तु” का अनुभव होता है। इसलिए physical world और experienced world के बीच perception और mind की महत्वपूर्ण भूमिका है।

यहीं आधुनिक consciousness theories रोचक हो जाती हैं।

Roger Penrose और Stuart Hameroff की Orch-OR theory प्रस्तावित करती है कि neurons के microtubules में होने वाली quantum प्रक्रियाएँ consciousness से संबंधित हो सकती हैं। यह अभी एक controversial hypothesis है, स्थापित वैज्ञानिक तथ्य नहीं।

इसके साथ Global Neuronal Workspace Theory यह समझने का प्रयास करती है कि किस प्रकार information व्यापक neural networks में उपलब्ध होकर conscious experience बनती है। Integrated Information Theory (IIT) दूसरी दिशा से पूछती है कि किसी physical system में consciousness के लिए किस प्रकार की integrated information आवश्यक हो सकती है।

इन सभी दृष्टिकोणों के बीच एक मूल प्रश्न बचा रहता है:

Neural activity तो दिखाई जा सकती है, लेकिन उस activity का subjective अनुभव क्यों होता है?

यही consciousness का hard problem है।

पतंजलि का दृष्टिकोण यहाँ अत्यंत मौलिक है। वे केवल यह नहीं पूछते कि “चेतना कैसे उत्पन्न होती है?”, बल्कि यह पूछने की दिशा देते हैं:

“वह कौन है जो विचारों, भावनाओं और अनुभवों को देख रहा है?”

धारणा से ध्यान और ध्यान से समाधि की यात्रा में बाहरी वस्तु से ध्यान धीरे-धीरे स्वयं awareness की ओर मुड़ता है।

इसलिए इस पूरे विमर्श का अंतिम प्रश्न हो सकता है:

“क्या हम केवल ब्रह्मांड को observe कर रहे हैं, या स्वयं observation की प्रक्रिया भी ब्रह्मांडीय वास्तविकता को समझने की कुंजी है?”

लहर का अपना रूप है, लेकिन वह समुद्र से अलग नहीं है।
मनुष्य का अपना व्यक्तित्व है, लेकिन उसका जीवन निरंतर ब्रह्मांड से संवाद करता है।

और शायद योग का सबसे बड़ा प्रयोग यही है—
बाहरी ब्रह्मांड को देखने के बाद, भीतर के observer को देखना।

No comments:

Post a Comment

Navmi pujan