प्राचीन भारतीय वनस्पति विज्ञान: वृक्ष आयुर्वेद और पारिस्थितिक जीवन-दृष्टि
प्राचीन भारतीय वनस्पति विज्ञान: वृक्ष आयुर्वेद और पारिस्थितिक जीवन-दृष्टि भूमिका: आधुनिक युग में प्राचीन ज्ञान की प्रासंगिकता आज का मानव जब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के ह्रास और ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर वैश्विक समस्याओं से जूझ रहा है, तब विज्ञान और प्रकृति के बीच के इस द्वंद्व का समाधान पाने के लिए हमें अपनी प्राचीन जड़ों की ओर लौटना अनिवार्य हो जाता है। आधुनिक विज्ञान भले ही वृक्षों को केवल एक जैविक संसाधन या कार्बन सोखने वाले जीव के रूप में देखता हो, किंतु भारतीय ज्ञान-परंपरा (Indian Knowledge Systems) ने सदियों पहले यह पहचान लिया था कि वनस्पति जगत केवल जड़ पदार्थ नहीं है, बल्कि वह चेतना, प्राण और संवेदनाओं से युक्त एक जीवंत इकाई है। वेद, आयुर्वेद और कृषि विज्ञान के समन्वय से विकसित 'वृक्षायुर्वेद' (वृक्ष + आयुर्वेद) प्राचीन भारत का वह अनुपम ग्रंथ और विज्ञान है, जो पौधों के जन्म, पोषण, स्वास्थ्य, रोगों और उनके उपचार के रहサों को वैज्ञानिक रूप से उद्घाटित करता है। यह लेख वृक्ष आयुर्वेद के इन्हीं ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और दार्शनिक आयामों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है...